आप सवालों के बीच उठें-बैठें, जीवन निस्संदेह सुंदर से सुंदरतम की ओर बढ़ेगा।

जीवन सवाल पूछने और उसका जवाब तलाश करने की कोशिश है। कहते हैं कि सवाल कोई हो, कभी गलत नहीं हो सकता। जवाब सही या गलत हो सकते हैं। समाज सवाल पूछने वालों से घबराता है। ऐसी व्यवस्था रची जाती है कि सवाल कम से कम उठें। फिर भी जो सवाल उठाते हैं, समाज अंतत: उनकी कद्र करता है।

उपन्यासकार फ्रेंज काफ्का कहते थे- आप सवालों के बीच उठें-बैठें, जीवन निस्संदेह सुंदर से सुंदरतम की ओर बढ़ेगा। काफ्का ने एक उपन्यास लिखा था- द ट्रॉयल।  यह एक ऐसे व्यक्ति के संघर्ष की कहानी है, जो संगठनवादी व्यवस्था का शिकार है और उससे छूटने के लिए छटपटा रहा है। उसके पास कई सवाल हैं, जिनका वह जवाब चाहता है। आपके सवाल जैसे-जैसे बढ़ते जाते हैं, चीजों के प्रति आपका दृष्टिकोण बनता जाता है। आप जागरूक हो जाते हैं। इंसानियत की कद्र करना सीख लेते हैं। जटिल चीजों को सुलझाते हैं और निरंतर सरल होते जाते हैं।

ऐसा ही सदियों पहले रोम के राजा मार्कस ऑरेलियास ने किया था। वह अन्य रोमन राजाओं की तरह सत्ता, शक्ति और संपन्नता के लिए नहीं, अपने सवालों के लिए जाने जाते हैं। उन्हें दो सवाल अक्सर मथा करते- वह कौन हैं? उनके होने का क्या अर्थ है? बरसों बेचैन रहे, तब जवाब मिला- तुम वही हो, जो तुम सोचते हो और तुम्हारा जीवन उसी रंग में रंगा है, जैसा तुम्हारे विचारों का रंग है। हम उनकी तरह दार्शनिक भले न बनें, पर मनुष्य होने का गौरव तो प्राप्त करें। इसके लिए हमारे भीतर सवाल का उठना अनिवार्य है।

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