जब भी कोई व्यक्ति हमारे जीवन में आता है, हम उससे अपनी अपेक्षाओं पर खरे उतरने का बोझ डाल देते हैं।

यहां तक कि आने वाला एक शिशु हो, तब भी हम अपने जीवन की अतृप्त आकांक्षाओं व असफलताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी उस पर डाल देते हैं। इसे प्यार का नाम दिया जाता है। यह स्थिति जड़ और चेतन, सबके प्रति होती है। जो उम्मीदों पर खरा न उतरे, उससे निराश ही नहीं होते, बल्कि हमारा प्यार नफरत में बदल जाता है। प्यार एक एहसान लगने लगता है। यह स्थिति डरावनी है, क्योंकि प्यार करना एक की इच्छा या जरूरत है, तो उसका वैसे ही लौटाना या लौटा पाना जरूरी क्यों है? चाहने वाले को आजादी है, तो पानेवाले को क्यों नहीं?

बच्चे के बारे में माता-पिता या परिवार की सोच या आशा, उसके भविष्य को मद्देनजर रखते हुए सही होती है, पर वे भी उसे सोचने का मौका देते हैं। जब अनजान व्यक्ति निर्णायक बनने की कोशिश करते हैं, तब विकृति आती है। कुछ मुद्दे ऐसे जरूर होते हैं, जो समाज के गठन को हिला सकते हैं, पर हर बात को उसी ढंग से उठाना सही नहीं है। ऐसे मुद्दों पर समुचित रूप से संतुलित रुख अपनाना जरूरी होता है। यूजी कृष्णमूर्ति का मानना है कि प्रकृति में नाश नहीं होता। होता सिर्फ इतना है कि परमाणुओं की जगह बदल जाती है। अगर संपूर्ण ब्रह्मांड में ऊर्जा का सही संतुलन बनाने के लिए नाश की जरूरत होती, तो वह अवश्य आता। मगर इंसान हर बात पर नाश को ही एकमात्र उपाय क्यों सोचता है? परमशक्ति और प्रकृति से भी खुद को ऊपर समझने वाले की सोच संकुचित है और संकुचितता विकास का अवसर नहीं देती। इसलिए बढ़ना है, तो समझकर चलना जरूरी है। 

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